चार बुनियादी सिद्धांत
लेखक: शैख़ मुहम्मद इब्न अब्दुल-वह्हाब
“जान लो—अल्लाह तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता की तौफ़ीक़ दे—कि शुद्ध और सीधे दीन, अर्थात् इब्राहीम के दीन का अर्थ है केवल अल्लाह की इबादत करना और दीन को पूरी तरह उसी के लिए ख़ालिस रखना।”
“जब इबादत में शिर्क शामिल हो जाता है, तो वह उसी प्रकार दूषित और अमान्य हो जाती है, जिस प्रकार छोटी हदस (वुज़ू तोड़ने वाली अवस्था) पाकीज़गी की अवस्था को समाप्त कर देती है।”
“जब तुम यह जान लो कि शिर्क, इबादत में शामिल होकर उसे अमान्य कर देता है, अमल को व्यर्थ कर देता है, और यह कि ऐसा करने वाला व्यक्ति हमेशा के लिए आग में रहेगा, तो तुम्हें समझ आ जाएगा कि तुम्हारे लिए सीखने की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है, ताकि उम्मीद है कि अल्लाह तुम्हें इस जाल से बचा ले: अर्थात् अल्लाह के साथ साझी ठहराने से।”
चार बुनियादी सिद्धांत
“जिन काफ़िरों से अल्लाह के रसूल ﷺ ने युद्ध किया, वे यह स्वीकार करते थे कि अल्लाह ही पैदा करने वाला, रोज़ी देने वाला, जीवन देने वाला, मृत्यु देने वाला और तमाम मामलों का प्रबंधन करने वाला है। फिर भी, केवल इस बात को स्वीकार करना उन्हें इस्लाम में प्रवेश दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं था।”
“वे कहते थे: ‘हम तो केवल उन्हें पुकारते हैं और उनकी ओर रुख़ करते हैं, इस उम्मीद में कि वे हमें अल्लाह के निकट कर देंगे और हमारी ओर से सिफ़ारिश करेंगे। वास्तव में, हम उनसे नहीं, बल्कि अल्लाह से माँगते हैं; लेकिन हम उनसे सिफ़ारिश के माध्यम से अल्लाह से माँगते हैं और उनके ज़रिए अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करना चाहते हैं।’”
“नबी ﷺ ऐसे लोगों के बीच भेजे गए थे जो इबादत के बहुत भिन्न-भिन्न तरीक़े अपनाते थे। उनमें से कुछ सूरज और चाँद की इबादत करते थे, कुछ फ़रिश्तों की इबादत करते थे, और कुछ पेड़ों तथा पत्थरों की इबादत करते थे।”
“हमारे समय के मुशरिकों का शिर्क पहले के मुशरिकों के शिर्क से अधिक गंभीर है। पहले के मुशरिक कठिनाई के समय अल्लाह के लिए इबादत को ख़ालिस कर लेते थे, लेकिन सुख-समृद्धि के समय उसके साथ साझी ठहराते थे। इसके विपरीत, हमारे समय के मुशरिक हर समय शिर्क करते हैं—चाहे सुख-समृद्धि हो या कठिनाई।”
और अल्लाह, जो अत्यंत महान और पवित्र है, सबसे बेहतर जानता है। मुहम्मद ﷺ, उनके परिवार और उनके सहाबा पर सलाम और अल्लाह की रहमतें व बरकतें नाज़िल हों।